राजस्थान में UCC पर नई बहस: भाजपा सांसद ने आदिवासियों को कानून से बाहर रखने की उठाई मांग, धर्मांतरितों पर लागू करने की वकालत
New debate on UCC in Rajasthan: BJP MP demands
राजस्थान में समान नागरिक संहिता (UCC) को लेकर तैयारियां तेज हो गई हैं। सरकार मानसून सत्र में इस कानून को विधानसभा में लाने की दिशा में काम कर रही है। ड्राफ्ट तैयार किया जा रहा है और सुझाव भी आमंत्रित किए जा रहे हैं। लेकिन इसी बीच सत्ताधारी भाजपा के एक सांसद की मांग ने पूरे मुद्दे को नया मोड़ दे दिया है। उदयपुर से भाजपा सांसद मन्नालाल रावत ने मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा सरकार से आग्रह किया है कि राज्य के आदिवासी समुदायों को प्रस्तावित यूसीसी के दायरे से बाहर रखा जाए। साथ ही उन्होंने धर्मांतरण कर चुके लोगों पर यह कानून पूरी तरह लागू करने की वकालत की है।
सांसद की इस मांग ने यूसीसी को लेकर नई बहस छेड़ दी है। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या राजस्थान भी उत्तराखंड और गोवा की तरह आदिवासियों को विशेष छूट देगा या फिर पूरे राज्य में एक समान कानून लागू होगा?
उत्तराखंड और गोवा मॉडल अपनाने की मांग
मन्नालाल रावत का कहना है कि राजस्थान को यूसीसी लागू करते समय उत्तराखंड और गोवा मॉडल का अनुसरण करना चाहिए। उन्होंने कहा कि इन राज्यों में अनुसूचित जनजातियों (ST) को यूसीसी से बाहर रखा गया है। राजस्थान में भी यह छूट टीएसपी (Tribal Sub Plan) और नॉन-टीएसपी दोनों क्षेत्रों में रहने वाले सभी आदिवासी समुदायों को मिलनी चाहिए।
उनका तर्क है कि आदिवासी समाज की सामाजिक व्यवस्था, विवाह और पारिवारिक परंपराएं देश के अन्य समुदायों से अलग हैं। ऐसे में उन पर एक समान कानून लागू करना उनकी सांस्कृतिक पहचान और पारंपरिक व्यवस्था पर सीधा असर डाल सकता है।
क्यों जताई चिंता?
सांसद ने कहा कि दक्षिण राजस्थान के आदिवासी इलाकों में कई ऐसी परंपराएं आज भी प्रचलित हैं, जो सदियों पुरानी हैं और समाज की मान्यता प्राप्त व्यवस्था का हिस्सा हैं।
इनमें प्रमुख रूप से—
- * नाता प्रथा, जिसे पुनर्विवाह की पारंपरिक व्यवस्था माना जाता है।
- * पारंपरिक पंचायतों के माध्यम से तलाक, जिसे समुदाय मान्यता देता है।
- * बिना औपचारिक रजिस्ट्रेशन के पारंपरिक रीति-रिवाजों से विवाह, जो आदिवासी समाज में सामान्य प्रथा है।
रावत का कहना है कि यदि यूसीसी के तहत अनिवार्य विवाह पंजीकरण, अदालत से मान्यता प्राप्त तलाक, एक-पत्नी/एक-पति व्यवस्था (मोनोगेमी) और समान उत्तराधिकार कानून लागू किए गए तो इन परंपराओं का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जो अनुसूचित जनजातियां आज भी अपनी मूल परंपराओं और कस्टमरी प्रथाओं का पालन कर रही हैं, उन्हें यूसीसी से बाहर रखा जाना चाहिए।
धर्मांतरित लोगों पर क्या बोले सांसद?
सांसद मन्नालाल रावत ने अपने बयान में एक और महत्वपूर्ण मांग रखी। उन्होंने कहा कि यह छूट केवल उन्हीं आदिवासियों को मिलनी चाहिए जो अपनी पारंपरिक आदिवासी संस्कृति और रीति-रिवाजों का पालन करते हैं।
उन्होंने न्यायालयों के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि कोई व्यक्ति आदिवासी परंपराओं को छोड़कर किसी अन्य धर्म, जैसे ईसाई धर्म, को अपनाता है तो उसे उसी आधार पर विशेष छूट नहीं मिलनी चाहिए।
रावत के मुताबिक, ऐसे धर्मांतरित व्यक्तियों पर यूसीसी पूरी तरह लागू होना चाहिए। उनका कहना है कि जिस प्रकार कुछ मामलों में धर्म परिवर्तन के बाद कानूनी संरक्षण की स्थिति बदलती है, उसी प्रकार यूसीसी के मामले में भी अलग व्यवस्था होनी चाहिए।
सरकार ने शुरू किया राज्यव्यापी परामर्श
राजस्थान सरकार प्रस्तावित यूसीसी को लेकर राज्यभर में सुझाव जुटा रही है। ड्राफ्टिंग कमेटी विभिन्न वर्गों, संगठनों और आम लोगों से राय ले रही है ताकि कानून का अंतिम मसौदा तैयार किया जा सके।
सरकार की कोशिश है कि व्यापक सहमति के साथ मसौदा तैयार कर आगामी मानसून सत्र में इसे विधानसभा में पेश किया जाए। हालांकि अभी तक सरकार की ओर से यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि आदिवासी समुदायों को कानून से छूट देने के मुद्दे पर अंतिम फैसला क्या होगा।
अब सबकी नजर सरकार के फैसले पर
भाजपा सांसद मन्नालाल रावत की मांग ऐसे समय आई है जब यूसीसी को लेकर राज्य में चर्चा अपने चरम पर है। एक ओर सरकार कानून लागू करने की तैयारी कर रही है, तो दूसरी ओर आदिवासी समुदायों की पारंपरिक व्यवस्था और संवैधानिक अधिकारों को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या राजस्थान सरकार उत्तराखंड मॉडल अपनाते हुए आदिवासियों को यूसीसी से बाहर रखेगी या फिर पूरे राज्य में बिना किसी अपवाद के समान नागरिक संहिता लागू करने का फैसला करेगी। आने वाले मानसून सत्र में इस पर तस्वीर साफ होने की उम्मीद है।